क्या स्वाद है जिंदगी में

क्या स्वाद है जिंदगी में
क्या स्वाद है जिंदगी में

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

अरबी के कोफ्ते.....

 अरबी के कोफ्ते- 




सामग्री- 

अरबी के कोफ्ते- 

सामग्री-

7-8 मध्यम  आकार की अरबी

2 बड़े प्याज

7-8 कलियाँ लहसुन

1/2 इंच अदरक

2 हरी मिर्च

3 टमाटर

 1/4 चम्मच अजवाइन

1/4 चम्मच जीरा

 1/4 चम्मच हल्दी

मिर्च स्वादानुसार

1/2 चम्मच पिसा धनिया

नम

क स्वादानुसार

विधि-

अरबी को छिलके सहित उबाल लें.  नरम होने पर छिलके हटा कर अच्छी तरह मैश कर लें. अब अरबी में  मैदा, कॉर्नफ्लोर और नमक मिलाकर अच्छा मिश्रण तैयार करें. अरबी लिसलिसी होने के कारण गोले बनाने में हाथ में चिपकती है इसलिए हाथ को तेल से चिकना कर लें. 

छोटे /बड़े (इच्छानुसार) गोले बनाकर कोफ्तों का आकार देते हुए तल लें. कोफ्ते पेपर पर रख कर अतिरिक्त तेल सोखने दें.

लहसुन, अदरक, हरी मिर्च, टमाटर  को  ग्राइंडर में पीस कर पेस्ट बनायें.  प्याज को बारीक काटें. आधी हरी मिर्च भी बारीक काटें.  कड़ाही में तेल गरम करें. तेजपत्ता डालकर अजवाइन और जीरा डाल दें. फिर प्याज और हरी मिर्च डालकर प्याज के गुलाबी होने तक भूनें. अब टमाटर-लहसुन का पेस्ट डालकर तेल छूटने तक अच्छी तरह भूनें. भूनते समय हल्दी, नमक, मिर्च और सूखा धनिया भी मिलायें.  अब इसमें रसा बनाने के लिए आवश्यकतानुसार पानी डालें.  डोंगे में कोफ्ते रखकर उपर से ग्रेवी डालें.  उपर से पनीर या चीज कद्दूकस कर डालें. बारीक कटा हरा धनिया बुरक कर सर्व करें.

शनिवार, 22 अगस्त 2020

गणपति को अर्पित हरे लड्डू...

 बेसन,मूँग , मक्का/बाजरा सब ही पीसेंगे. मूँग के लड्डू बनानेके लिए इस बार साबूत मूँग पीस लिए. आटे को चलनी से छानकर  घी मिलाकर खूब अच्छी तरह सेका. इलायची और बूरा शक्कर मिलाया और फटाफट हरे लड्डू बाँध लिये. हरी दूब के साथ गणपति को हरे लड्डू बिना रंग मिलाये अर्पित कर मन प्रसन्न हो गया.लड्डू बनाने की विधि वैसी ही जैसे की बेसन के लड्डू बनाते हैं. 

#मूँग के #लड्डू -

दो कटोरी मूँग के पीसे आटे में लगभग एक कटोरी घी डालकर भूनना है.  अच्छी तरह भून लें. लगभग डेढ़ कटोरी बूरा शक्कर या पिसी चीनी मिलायें. चार पाँच मोटी इलायची  कूट पीस कर डालें और #लड्डू बना लें.  

खूबसूरती बढ़ाने के लिए लड्डू पर वर्क या काजू/बादाम के टुकड़ों से सजाया जा सकता है.

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

तुरत फुरत लड्डू /चूरमा...






एक दिन खाना बनाते हुए अचानक पतिदेव ने पूछ लिया कि कुछ मीठा नहींं है क्या आज खाने में.   खाना लगभग पूरा बन चुका था और बच्चे टेबल लगाकर इंतजार कर रहे थे.  एकदम से समझ नहीं आया कि इतनी जल्दी में मीठा क्या बने. परात में दो चपाती का आटा बचा हुआ था जिसकी एक ही बनानी थी.  थोड़ी मोटी रोटी जो बीच में  घी लगाकर  दो तीन बार  तह कर बनाई जाती है, उसे यहाँ साटा रोटी कहते हैं. वैसी ही रोटी सेक कर रखने ही लगी थी कि एक आइडिया आया दिमाग में . मोटी रोटी के बीच में बूरा शक्कर डालकर उपर से थोड़ा घी और डाल दिया और हाथों से ही रोटी का चूरा करते हुए बूरे को अच्छी तरह मिलाते हुए लड्डू बना दिये. खाने के साथ मीठे का इंतजाम हो गया था . बच्चों को बहुत पसंद आया तो अगली बार  पूरी प्लानिंग से इसी तरह लड्डू बनाये. इस बार उसमें बूरा शक्कर के स्थान पर गुड़ का पाउडर डाला.
अगली बार एक प्रयोग और किया कि उसी मोटी रोटी को गरम ही मिक्सी में चला कर पाउडर जैसा बना लिया. बड़ी इलायची का पाउडर, ड्राई फ्रूट्स और कुछ अधिक घी मिलाकर चूरमा बना लिया. आधे चूरमे के लड्डू बाँध दिये. सारे प्रयोग सफल रहे और सबने सराहना कर भोग लगाया तो रेसिपी साझा करना उचित लगा.

आटे में घी का मोयन देकर पूड़ी के आटे जैसा गूँध लें.  5 मिनट ढ़क कर रेस्ट करने दें . अब दो चपाती के बराबर  लोई लेकर छोटे आकार की मोटी रोटी बेल लें.  रोटी को तवे और गैस पर अच्छी करारी होने तक सेक लें.
अब गरम रोटी पर ही घी और बूरा शक्कर या गुड़ मिला कर अच्छी तरह मिलाते हुए लड्डू बना लें.
इसी तरह मोटी रोटी बनाकर अच्छी तरह सेक कर गरम ही मिक्सी में चला लें. तुरंत निकाल कर पिघला घी ,  बूरा,पिसी इलायची, ड्राई फ्रूट्स डालकर अच्छी तरह सब सामग्री  आपस में  मिलायें.  चाहें तो लड्डू बना लें या फिर चूरमा जैसा ही सर्व करें.

घी, बूरा, गुड़ आदि की मात्रा अपने  स्वाद के अनुसार कम ज्यादा डालें. 

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कच्चे केले के कोफ्ते..... (Kofta curry)




चार कच्चे केले
1/4 कप मैदा
1/4 कप कॉर्नफ्लोर
1/4 कप खसखस
1/4 कप काजू
2 कप दूध
1/2 चम्मच चीनी
1/4 चम्मच जीरा
नमक स्वादानुसार
दो तेजपत्ता
एक बड़ी इलायची
छह सात दाने कालीमिर्च
1/4 चम्मच सोंठ पिसी या छोटा टुकड़ा अदरक...

कच्चे केलों को छिलके सहित उबाल लें. कुछ नरम होने पर छिलके हटा कर अच्छी तरह मैश कर लें. अब केले में मैदा और कॉर्नफ्लोर मिलाकर अच्छा मिश्रण तैयार करें. छोटे /बड़े (इच्छानुसार) गोले बनाकर कोफ्तों का आकार देते हुए तल लें. कोफ्ते पेपर पर रख कर अतिरिक्त तेल सोखने दें.
काजू और खसखस को एक कप दूध में आधे /एक घंटे के लिए भिगो दें. उसके बाद अच्छी तरह पीसकर पेस्ट बना लें.
पैन में एक छोटा चम्मच तेल और एक छोटा चम्मच घी गरम करें  (घी के स्थान पर बटर भी ले सकते हैं).गरम होने पर जीरा और तेजपत्ता डालें. फिर काजू- खसखस का पेस्ट डालकर  अच्छी तरह चलाते हुए भूनें.  फिर दो कप दूध डालकर अच्छी तरह उबाल कर ग्रेवी बनायें. काली मिर्च और बड़ी इलायची अच्छी तरह क्रश करके डाल दें. नमक और चीनी मिलायें. सोंठ पाउडर डालें . (अदरक डालना हो तो उसका पेस्ट बनाकर काजू-खसखस के  पेस्ट के साथ ही डालें).
अब एक प्लेट में कोफ्ते रखकर उपर से ग्रेवी डाल दें. बारीक कटा हरा धनिया डालकर गार्निश करें.
चार-पाँच फूलमखाने और किशमिश मिला देने से स्वाद में बढ़ोतरी होगी!
 नोट-  मेरे पास धनिया नहीं था तो बादाम-पिस्ता की कतरन और चिरौंजी से गार्निश किया.
कोफ्ते का मिश्रण न ज्यादा सख्त हो न ही ज्यादा नरम. कोफ्तों का आकार देने में परेशानी हो तो अँगुलियों/ हथेली पर पानी  लगाकर बनाये.


शनिवार, 4 मई 2019

ग्वारफली की ढ़ोकली...



ग्वारफली की ढ़ोकली....

एक कटोरी गेहूँ के आटे में एक चौथाई कटोरी बेसन मिलायें. एक छोटा चम्मच तेल डालकर हाथ से अच्छी तरह मिलायें.
नमक, अजवाइन डालकर पानी हाथों से  आटा मिलाते हुए गूँधें.  रोटी के आटे की तरह ज्यादा नहीं गूँधना है. इसकी छोटी छोटी लोईयाँ बनाकर चपटा करें और बीच में गड्ढ़ा करें. एक भगौने में पानी गरम रखें. उबाल आने पर सभी ढ़ोकलियाँ एक एक कर डाल दें. पाँच से दस मिनट तक उबलने दें. पकने पर ढ़ोकलियाँ ऊपर आ जायेंगी. निकालकर अलग रख लें. पानी फेंके नहीं.
ग्वारफली को छोटे टुकड़ों में काटें. कड़ाही मे तेल गरम कर राई, अजवाइन, जीरे का छौंक लगायें. हरी मिर्च बारीक काटकर डालें. अब ग्वारफली डालें.  नमक, मिर्च, हल्दी, सूखा धनिया डालें. अच्छी तरह मिलाकर थोड़ा पानी डालकर ढ़क दें. टमाटर छोटे टुकड़ों में काटें या पीस लेंं. फली नरम होने  टमाटर डालें. अच्छी तरह पकने पर ढ़ोकली और जिस पानी में उबाला था ,वह भी मिला दें.  गरम मसाला डालें. सूखी मेथी को हाथ से मसल कर डालें. बारीक कटे प्याज और हरा धनिया से गार्निश कर परोसें.

नोट- छौंक लगाने में साबुत गरम मसाला  भी डाल सकते हैं. इसके अलावा  प्याज , लहसुन आदि पीस कर या कूट कर भी डाल सकते हैं.

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

सप्तरूचिलू (युगादि पर बनाये जाने वाला विशेष प्रसाद)

 पतझड़ के मौसम में सब पुराने पत्ते झड़ जाने के बाद नीम कच्ची नाजुक कोपलों से भर जाता है और साथ ही उस पर बौर (फूल) लद जाते हैं. नीम के आयुर्वेदिक गुणों से हम भारतीय भली भाँति परीचित हैं. नीम की दातौन ने वर्षों हमारे दाँतों की रक्षा की है तो चैत्र के महीने में कोमल कोपलों का सेवन  वर्ष भर के लिए हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को संरक्षित करता है. अपने दुर्लभ गुणों के कारण नीम आदि वृक्षों को परंपरा से जोड़कर स्वस्थ रखने की प्रक्रिया भारतीय संस्कारों में जन्मघूँटी की तरह दी गई है.
स्वस्थ रहने के प्राकृतिक प्रयोगों की परंपरा  में  इसी प्रकार नव संवत्सर (युगादि/उगादि) पर दक्षिण भारत में प्रसाद रूप में सप्तरूचिलू बनाने की प्रथा है. तीखा,खट्टा, मीठा, कड़वा,नमकीन आदि सात प्रकार के स्वाद एक ही साथ शामिल होने के कारण सप्तरूचिलू  नाम दिया गया. इस मौसम में आसानी से और ताजा उपलब्ध स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों को लेकर बनाया जाने वाला सप्तरूचिलू प्रकृति के आशीष रूप में ई्श्वर को अर्पित कर प्रसाद रूप में  ग्रहण किया जाता है.
 





सामग्री -
कच्ची केरी
इमली
गुड़
नमक
लाल मिर्च पिसी हुई
नीम के फूल
शहद

विधि-
कच्ची केरी को कद्दूकस कर लें या बारीक टुकड़ों में काटें. इमली को पानी में भिगोकर बीज निकालकर गाढ़ा घोल  (पल्प) बना लें.
गुड़ के बारीक टुकड़े कर लें . अब सभी सामग्री को शहद मिलाते हुए चम्मच से अच्छी तरह मिला लें. चटनी तैयार है.

युगादि पर भीगी हुई मूँग की दाल में आम (केरी) के कटे टुकड़े , नमक, मिर्च आदि मिलाकर भोग बनाया जाता है. साथ ही गुड़ का सादा पानी और सप्तरूचिलू  चटनी भी भोग अर्पण कर प्रसाद  रूप में ली और वितरित की जाती है.


शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

बेसन के करैले.....

   
बेसन के करैले---
सामग्री
करैले बनाने के लिए
एक कटोरी बेसन
हींग चुटकी भर
जीरा चौथाई चम्मच
नमक एक चम्मच
लाल मिर्च पिसी एक चम्मच
तेल एक छोटी चम्मच
गुनगुना पानी
बेसन में सब सामग्री मिलाकर गुनगुने पानी से अँगुलियों से मिलाते हुए गूँधें. बेसन की छोटी लोई को बीच से दबाकर  किनारों से चपटा करते हुए नाव सी आकृति दें. दो गोलों को हाथ से बेलन के आकार में लंबा करें. खौलते पिनी में बेसन से बने करैले और गट्टे डाल दें. अच्छी तरह पकने पर उतार लें. पानी से करैले और गट्टे उतार लें. पानी को फेंके नहीं. यह ग्रेवी बनाने के काम आयेगा.
ग्रेवी के लिए सामग्री -
मूँगफली भुनी और छिलके उतरी हुई 2 चम्मच
तिल एक चम्मच (कड़ाही मेंं सूखा भून लें.)
नारियल पाउडर एक चम्मच (हल्का सा भूनें. ध्यान रहे कि रंग न बदले)
धनिया पिसा एक चम्मच
नमक ऐक चम्मच
मिर्च एक चम्मच
हल्दी आधा चम्मच
इमली थोड़ी सी बीज निकाली हुई
जीरा 1/2चम्मच
राई 1/2 चम्मच
हींग चुटकी भर
मीठा नीम सात आठ पत्तियाँ
सूखी लाल मिर्च एक
हरी मिर्च एक
अदरक छोटा टुकड़ा
गरम मसाला आधा चम्मच
तेल  एक बड़ा चम्मच

तिल, मूँगफली और नारियल को दरदरा पीस लें. हरी मिर्च और अदरक बारीक काट लें. इमली को गरम पानी में भिगोकर मसल लें.
कड़ाही में तेल गरम करें. राई, हींग और मीठा नीम और साबुत लाल मिर्च हाथ से तोड़कर डालें. राई तड़कने पर तिल, मूँगफली का मसाला डालें . इमली का पल्प डालें. थोड़ा सा पानी डालें. अब नमक, मिर्च, हल्दी भी डाले और उबाल आने दें. फिर बेसन के करैले साबुत और गट्टों को गोल काटकर डालें. थोड़ा चलाकर करैले और गट्टे उबाला हुआ पानी भी डाल दें. ग्रेवी गाढ़ी होने पर गरम मसाला डालें. बारीक कटा धनिया डाल दें. चावल या चपाती के साथ परोसें.

नोट-
पारंपरिक राजस्थानी भोजन में गट्टे की सब्जी का विशेष स्थान है. गट्टे की सब्जी की एकरसता से उब गये हों तो बेसन की यह भरवाँ सब्जी बनाकर देखें. भरवाँ करैले के मसाले के साथ यह बेसन के करैले बनायें। स्वाद लाजवाब होगा

सोमवार, 11 जून 2018

कढ़ी ढ़ोकला....

राजस्थानी भोजन में कढ़ी का मेल चावल के साथ माना जाता है जबकि दाल का बाटी के साथ.
गुजरात में फाफ़डा, ढोकला, समोसा, खिचडी आदि के साथ कढ़ी परोसी जाती है.  इसके साथ मक्का या गेहूँ के आटे के ढोकले बनाये जाते हैं.
जोधपुर के परम्परागत खाने में कढ़ी ढ़ोकले का मेल लोकप्रिय है.

कढ़ी ढ़ोकला
कढ़ी  की रेसिपी अलग से बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि दाल की ही तरह यह भी लगभग प्रत्येक घर में बनाई खाई जाती है. दही /छाछ और बेसन को मिलाकर नमक, हल्दी, मिर्च डालकर कई उबाल आने तक धीमी और मध्यम आँच पर पकाना है. फिर कड़ाही या पैन में तेल लेकर राई, हींग, मीठा नीम और दानामेथी का तड़का लगाकर कढ़ी में मिला कर ढ़क दें.

ढ़ोकला बनाने के लिए

सामग्री -
2 कटोरी आटा
1बडी चम्मच घी या तेल मोयन के लिये
1 छोटा चम्मच नमक
1 छोटा चम्मच अजवाईन
1 छोटी चम्मच खाने का सोडा
1 बडी चम्मच  अदरक, लहसुन, हरी मिर्च का बारीक पिसा पेस्ट (ऐच्छिक)
आटे में तेल या घी को अच्छी तरह हाथ से मसलते हुए  मिलायें. इसमें नमक, अजवाईन , सोडा डाल कर फ़िर से मिलायें. अब अदरक , लहसुन, हरी मिर्च का पिसा हुआ मसाला मिलायें और पानी डालकर हलके हाथ से गूंध लें. इसे रोटी के आटे की तरह अधिक नहीं गूंधना है, बस हलके हाथ से मिलाना भर है. हाथ से थपक कर छोटे गोले बनाये  और हथेली पर पूड़ी के आकार में मगर थोडा मोटा फैला दें. बीच में एक अँगूली जितना छेद करें.
अब भाप में  इडली या खम्मन की तरह पकायें.  चाकू लगा कर चेक करें.यदि पक गया होगा तो उससे चिपकेगा नहीं. पकने पर प्लेट में निकालें और उपर से घी लगायें. कढी के साथ परोसें.
यदि मक्के के आटे से बना रहे हैं तो सोडा के स्थान पर बहुत कम मात्रा में पापड़ खार लें और गूंथने के लिये गुनगुने पानी का प्रयोग करें.

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017









कलकत्ता चाट भंडार- जयपुर में कार्यरत शायद ही कोई सरकारी कर्मचारी (क्योंकि यह चाट भंडार ऐसे स्थान पर है जहाँ अधिकांश सरकारी विभागों के भवन हैं) होगा जिसने यहाँ चटखारे लेकर स्वाद न लिया या इसके बारे में जानता नहीं....


आँच से उतरते मूँग की दाल के गरम चिल्लों(चिलड़ा, पैनकेक) के साथ उतनी ही तीखे स्वाद की लहसुन की चटनी, धनिया/पुदीने की हरी चटनी, इमली गुड़ की सोंठ वाली चटनी, चटपटे काले चने, मीठा और नमकीन दही मिलकर चटपटी चाट जैसा जो जायका देते हैं, स्वाद के शौकीनों को बार बार आने पर विवश करते हैं....
इनके प्रशंसक स्वाद के मारे लोगों का आलम यह है कि कई बार एक- एक घंटे तक अपनी बारी का इंतजार करते हैं...
हमने भी ठानी घर पर ही इस स्वाद को आजमाने की....

मूँग की धुली दाल को रात में भिगोया....सुबह हरी मिर्च, अदरक डालकर पीस लिया....नमक डालकर आधा  घंटे के लिए रख दिया .  (तुरंत पीस कर भी बना सकते हैं. बस घोल को अच्छी तरह फेंटना है और डोसे के घोल की तरह न ज्यादा गाढ़ा, न ज्यादा पतला रखना है )
हींग,कटा धनिया,  मिलाकर अच्छी तरह फेंटा . खूब गरम तवे पर चिकनाई लगाकर घोल को गोल आकार में फैलाकर उपर से बारीक कटे टमाटर, प्याज,हरी मिर्च डाले. सिकने पर सावधानी से पलटा और दूसरी तरफ से भी अच्छी तरह सेक लिया. गरमागरम चिल्लों के  साथ बना हरी चटनी, लहसुन की तीखी चटनी ,इमली गुड़ की खट्टी मीठी चटनी और दही के साथ लाज़वाब स्वाद का आनंद लिया....चटपटे चने नहीं बनाये मैंने मगर यह स्वाद भी कम नहीं था....
तो जब भी जयपुर के सरकारी कार्यालयों, सचिवालय, हाई कोर्ट आदि में किसी कार्य से आना हो तो कलकत्ता चाट भंडार का स्वाद लेना न भूलें....
और वहाँ आना या जाना न हो सके तो घर पर ही बनायें, खायें और खिलायें भी....






मंगलवार, 11 जुलाई 2017

गुलाब चंद डेयरी.....स्वाद जयपुर का

हमारा शहर जयपुर जितना अधिक अपने हैरिटेज और गुलाबीपन के लिए जाना जाता है उतना ही अपने ठसके वाले देसी खान पान और उनके खास ठिकानों के लिए भी... किसी रास्ते के समोसे कचौरी, किसी गली की नमकीन सेव, कोई खास दुकान कुल्फी की तो किसी हलवाई का मूँगथाल....इतना ही नहीं भुने चने ,मूँगफली, मिल्कशेक के भी खास ठिकाने हैं. स्वाद के लिए कुछ किलोमीटर का सफर करने में भी हिचक नहीं स्वाद के शौकीनों को....

ऐसा ही ठेठ देसी पेय का ठिकाना है चौड़ा रास्ता में...

 







सन् 1963 से छाछ और मक्खन के शौकीन जुटते रहे हैं गुलाबचंद डेयरी पर....पैकेज्ड माल वाले इस जमाने में ब्रांडेड शीतल पेय की दीवानी पीढ़ी वाले इस समयमें भी यहाँ जुटती भीड़ इनकी विशिष्टता आप ही बताती है.
सादी छाछ,  नमक जीरे पुदीने की छाछ, लस्सी, सादा मक्खन, केसर वाला मक्खन ...वर्ष भर ही चलता है यह कारोबार मगर गर्मियों और उमस वाली सुबह में छाछ का स्वाद जो तृप्ति देता है, वह बस स्वाद लेकर ही जाना जा सकता है... पत्ते पर दिये जाने वाले सादा मक्खन के साथ केसर पिस्ता के रंग और स्वाद का कहना ही क्या...माखनचोर की नजर भी जरूर इस ओर ही लगी रहती होगी...
मतलब इतना सा है कि अगर चौड़ा रास्ता से ताड़केश्वर शिव के दर्शन कर निकल रहें हों या पैदल शॉपिंग करने निकलें हो तो तुरंत फुरंत स्फूर्ति के लिए थोड़ा आगे बढ़कर छाछ और मक्खन के स्वाद का लुत्फ जरूर लें..

गुरुवार, 9 मार्च 2017

मालपुआ रबड़ी.....



मालपुआ रबड़ी
सामग्री -
 मालपुए के  लिए - एक कटोरी मैदा , आधा कटोरी दूध, दो हरी इलाईची .
चाशनी - एक कटोरी चीनी , आधा कटोरी पानी , केसर के दो पत्तियां...
रबडी - एक लीटर  दूध , एक चुटकी केसर , इलाईची ,एक छोटी चम्मच  चिरौंजीऔर  बादाम -पिस्ता  की कतरन...
एक कटोरी मैदे को आधा कटोरी दूध में घोलें. पुए बनाने से पहले कम से कम एक घंटा  पहले घोल कर रखें.
रबडी के लिये एक लीटर दूध को गाढा करें . मलाई को किनारे करते जायें. पर्याप्त गाढा होने पर 250 ग्राम चीनी डालें. चम्मच से चलाते रहें ताकि चिपके नहीं. इलाइची का चुर्ण डालें. दो पट्टी  केसर के दूध में मिलाकर डालें .  पुए बनने तक एक तरफ़ रख दें. रबडी को अपनी इच्छानुसार गाढा या  पतला रखें.
एक तरफ़ चीनी की एक तार की चाशनी बनायें. इसके लिये एक कटोरी चीनी को आधी कटोरी पानी डालकर चाशनी बनने तक पकायें. चाशनी बनाने के बीच में चुटकी भर केसर पानी में घोल कर मिलायें. पुए बनाते समय चाशनी को बिल्कुल कम आंच पर रखें.

एक तरफ़ गैस पर चौडे पेन्दी वाला पैन रखें. इसके लिये विशेष आकार की कडाही /पैन लिया जाता है जिसका पेन्दा समतल हो. राजस्थान में इसे तई कहा जाता है. नहीं तो डोसा बनाने वाले  नॉन स्टिक तवे को भी काम में लिया जा सकता है.  मैदे के घोल को चम्मच से अच्छी तरह मिलायें. गर्म तवे को घी से चिकना करें. एक छोटी चम्मच में घोल लेकर तवे पर फैलायें. इनका आकार छोटा ही रखा जाता है. पलटे की सहायता से दोनों ओर से हलके हाथ से दबाकर सेकें. किनारों पर घी छोड़ते जायें.  एक  बार में तीन चार पुए आराम से बन सकते हैं. इन्हें तवे से उतार कर चाश्नी में डालें. पैन पर दुबारा चम्मच से घोल डाल कर पुए बनाए.  चाशनी से पुए निकालकर कुछ देर जालीदार चम्मच पर रखें ताकि अतिरिक्त चाशनी निकल जाये.
एक प्लेट में सभी पुओ को रख लें. परोसते समय एक चम्मच रबडी पुए के बीच में रखें. पिस्ता, चिरौंजी और बादाम की कतरन से सजायें.
रबडी को परोसने के समय ही डालना है वरना पुए का कुरकुरापन कम हो जायेगा.

यदि रबडी पतली रखनी हो तो पुए को रबड़ी में डिप कर के परोसें. यदि गाढ़ी  पसंद है तो पुए पर उपर से डालें.



बुधवार, 1 मार्च 2017

बघारे बैंगन हैदराबादी

#बघारेबैंगन
#bagharebaingan
#बैंगनहैदराबादी

सामग्री 
5-6 छोटे बैंगन
1/2 कप मूँगफली
1/4 कप तिल
1/4 कप नारियल बुरादा 
2 छोटे चम्मच सूखा धनिया 
2 छोटे चम्मच जीरा
1 छोटी चम्मच राई साबुत
1छोटी चम्मच लाल मिर्च पाउडर
1 छोटी चम्मच नमक
1/2 छोटी चम्मच हल्दी पाउडर
1/4 चम्मच गरम मसाला पाउडर
इमली 1/4 कप या अंदाज़ से
1 बडा चम्मच तेल
कुछ पत्तियां मीठा नीम 
बारीक कटा धनिया

विधि-
मूँगफली को सूखा कडाही में भून लें. मसल कर छिलका उतारें. तिल को भी सूखा ही भूनें. 
अब तिल , मूँगफली, नारियल पाउडर, 1 छोटी चम्मच जीरा, धनिया (यदि साबुत हो तो) को मिक्सी में इकट्ठा पीसें.
इस मसाले में नमक, धनिया पाउडर , लाल मिर्च पाउडर , मिला कर रख लें.
इमली को कुछ देर भिगो कर रखें. मसल लें.
अब बैंगन को धोकर साफ़ कपडे से पोंछ लें. अब चाकू से दो कट इस प्रकार लगायें कि डंठल वाला किनारा जुडा रहे. तिल मूँगफली वाला मसाला सावधानी से बैंगन में भर लें. बाकी मसाला एक तरफ़ रख लें.
अब कडाही में तेल डालें. राई और जीरे का छौंक लगायें. जीरा सुनहरा होने पर मीठा नीम और बारीक कटी हरी मिर्च डालें. अब मसाला भरे बैंगन तेल में डाल कर हल्के हाथ से नरम होने तक उलट पलट लें. बाकी बचा मसाला भी डाल लें. आधा कप पानी डालकर ढक दें. बैंगन अधपके होने तक यदि और पानी की आवश्यकता है तो डालें वर्ना तेल में ही मसाला किनारे छोड़ने तक पकायें. फिर इमली का गूदा मसल कर सब्जी में मिलायें. मसाला अधिक गाढा हो तो थोडा पानी और मिलायें. एक उबाल आने और बैंगन पकने तक आंच पर रखें.
हरा धनिया बारीक काट कर बुरक लें.

इस सब्जी के परंपरागत विधि में तेल सब्जी के उपर तैरना चाहिये और सब्जी का रंग मिर्च के कारण लाल रहता है. हम अपने स्वाद और सेहत के अनुसार तेल और लाल मिर्च की मात्रा कम अधिक रख सकते हैं.
इसी मसाले और विधि से भिंडी, टिंडा, हरी मिर्च, करैला, टमाटर, तोरई आदि की सब्जी भी बनाई जा सकती है.

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

बाजरे का खीचड़ा




बाजरे का खीचड़ा-

बाजरा को अच्छी तरह धोकर साफ करें और बस बाजरा गीला होने जितने पानी में दो घंटे भिगो दें. पानी से निकालकर कपड़े पर फैला दें ताकि पूरा पानी निकल जाये. अब नम बाजरे को 2 मिनट ओखली में कूटें जिससे बाजरे का छिलका निकल जाये. बाजरे को ओखली से निकालकर  फटक कर छिलका अलग करें. एक बार फिर से यह प्रक्रिया दुहरायें. अब बचे बाजरे को दरदरा कूट लें.
चँवले की दाल और चावल को भिगो कर रखें. (साबुत चँवला भी ले सकते हैं)
भारी तले के भगोने में पानी उबलने रखें. उबाल आने पर बाजरा, दाल और चावल डालकर चम्मच से हिलायें. स्वादानुसार नमक डालें.आँच को संतुलित रखते हुए पकाएं. इसका ध्यान रखना आवश्यक है  क्योंकि खीचड़ा बनते समय पानी
 तेजी से उफनता है. पूरा पकने की स्थिति में खिचड़े से तीव्र बुलबुले उठते हैं. सावधानी रखें.
मात्रानुसार आधे से एक घंटे का समय पकने में लगता है.  पकाने के लिए पूरी सामग्री का दुगुना पानी लें. यदि पानी कम लगे तब उसमें उपर से गरम पानी मिलाएं.
गरम गरम खीचड़ा थाली में लेकर बीच में गड्ढा सा कर घी डालें व गुड़ के साथ भोग लगायें.
कुछ लोग घी की बजाय शुद्ध तिल का तेल डालना पसंद करते हैं. देसी तरीका भी यही है. कुछ लोग गरम खीचड़ा दूध के साथ भी खाना पसंद करते हैं. ऐसी स्थिति में पकते समय नमक न डालें.
भीषण ठंड के समय रात के खाने में यह संपूर्ण भोजन है. रात में बना हुआ खीचड़ा दूसरे दिन सुबह छाछ में मिलाकर कच्चे प्याज के टुकड़े डाल कर खाने पर बहुत स्वादिष्ट लगता है.

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

लज़ीज़ उकरपिंडी वडनेरकरी......महाराष्ट्र का पारंपरिक व्यंजन

पारंपरिक व्यंजनों की श्रृँखला में अजीत वडनेरकर जी की रेसिपी प्रस्तुत है.....
लज़ीज़ उकरपिंडी वडनेरकरी

एक लज़ीज़ मराठी आहार है- उकरपिंडी। इसे अनेक लोग उकड़पेंडी भी कहते हैं। इन दो नामों का क्या चक्कर है इस पर पोस्ट के अन्त में चर्चा की जाएगी। उकरपिंडी अपन को बचपन से ही पसंद है। जहाँ तक याद आता है, उन शुरुआती चीज़ों में है जिन्हें छुटपन में पकाना सीखा था। उकरपिंडी हमने अपने भैया यानी पिताजी से सीखी।

इसे बनाने की विधि जानने से पहले बता दूँ कि चित्र में नज़र आ रही उकरपिंडी हमने पारम्परिक ढंग से न बनाते हुए अपने अंदाज़ से बनाई है। उकरपिंडी नाम से चक्कर में न पड़ें, बस इतना समझ लें कि जैसे रवा से उपमा बनता है वैसे ही उकरपिंडी आटे से बना उपमा है। हमने इसे बेजड़ के आटे से बनाया है। आमतौर पर मराठी लोग इसे गेहूँ के आटे से बनाते हैं। स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें चौथाई मात्रा से लेकर आधी मात्रा तक चने का आटा यानी बेेसन भी मिलाया जाता है। अपनी रेसिपी में हमने आधी मात्रा बेजड़ आटा (गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का) और आधी मात्रा बेसन रखी।

दो लोगों के लिए बेजड़ आटा एक कटोरी। बेसन एक कटोरी
समय तीस मिनट

विधि- आटे को आधी कड़छी तेल में अच्छी तरह भूना जाए। खुश्बू और रंगत से पता चल जाएगा। अलग से निकाल कर रख दें। एक बर्तन में पानी गर्म कर रख लिया जाए। एक कटोरी दही। 

समग्री- एक बड़ी कटोरी प्याज के लच्छे। चार कली लहसुन बारीक कटा। एक टुकड़ा अदरक बारीक कटा। कड़ुवा नीम पत्ता। किसा हुआ सूखा नारीयल। खूब सारा हरा धनिया। आधा चम्मच सफेद तिल।
तड़के के लिए- खड़ा धनिया, सौँफ और राई
कड़ाही में एक कड़छी तेल डाले। गरम होने पर राई धना तड़काएँ। प्याज के लच्छे, लहसुन-अदरक, कढ़ी पत्ता वगैरह सब चीज़ें डाल दें। अच्छी सुगन्ध आने पर भूना हुआ आटा इसमें मिलाएँ। नमक अंदाज़ से डालें। फिर दही डालकर तेज़ी से हिलाएँ। अब चुटकी भर पिसी सरसों और आधा चम्मच सौँफ पाउडर इसमें मिलाएँ। अचारी लज़्ज़त का मज़ा आएगा।

जब सारा मसाला मिल जाए तब धीरे धीरे गरम पानी डालते हुए लगातार हिलाया जाए। उपमा जितना गाढ़ा हो जाने पर जब भाप निकलने लगे तो ढक कर रख दें। पाँच मिनट बाद देखें कि जब निचली सतह सूखने लगे तो अच्छी तरह खुरच कर उपर नीचे कर दें।

यह क्रम करीब दस मिनट तकक अनेक बार दोहराएँ। अच्छी तर भूने जाने के बाद उकरपिंडी की रंगत लाल-भूरी होगी। थोड़ा ठण्डा होने पर प्लेट में निकालें। खूब सारा धनिया, खोपरा छिड़कें। तिल भी डालें। शानदार उकरपिंडी का आनंद ले।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

नारियल मूंगफली की बर्फी.....


सामग्री....

आधा कप नारियल का बुरादा
आधा कप मूँगफली
दो कप चीनी
आधा कप पानी
थोड़ी सी पीसी इलायची

विधि.....
मूंगफली को कड़ाही में बिना घी/ तेल भूनें। सिकने पर आंच से उतार कर हाथ से मसल कर छिलका उतार दें।
नारियल के बुरादे को बहुत थोड़ी से देर के लिए सूखा ही कड़ाही में भूनें। ध्यान रखें कि न यह जल पाए न ही रंग बदले.
अब मूंगफली और नारियल को मिक्सी में ग्राइंड करके एक तरफ रखें।
अब कड़ाही में आधा कप पानी और दो कप चीनी मिलाकर चाशनी बनायें। चाशनी को लगातार चलाते रहें। यह गुलाब जामुन की चाशनी से थोड़ी गाढ़ी होनी चाहिए। यदि अधिक गाढ़ी हो जाए तो बहुत कम मात्रा में उबलता पानी डालें जिससे बर्फी जमाने में असुविधा न हो। प्लेट टेस्ट कर या चम्मच से गिराकर टेस्ट किया जा सकता है।
अब आंच बंद कर जल्दी से मूंगफली और नारियल का मिश्रण मिलाएं और चिकनाई लगी प्लेट में जमाएं। ऊपर से पिसी इलायची बुरके। थोड़ी गरम में ही चाकू से मनचाहे आकार में निशान लगाकर छोड़ दें। ठंडी होने पर अलग करें।
बिना घी/ तेल की स्वादिष्ट पौष्टिक बर्फी तैयार है।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

आमेर की गूंजी और गाँठिये ......

जयपुर एक खूबसूरत पर्यटन  स्थल है और अपने देश ही नहीं ,  विदेशों में भी ख़ासा लोकप्रिय है। आंकड़ों के बिना भी  यहाँ की सड़कों पर घूमते सैलानियों को देख कर ही  अनुमान लगाया जा सकता है। कुछ समय के अंतराल में अपने शहर की खूबसूरती को पर्यटक की तरह निहारने में बड़ा आनंद है.  तेजी से चल रहे विस्तारण और विकास कार्यों  के कारण हर बार और अधिक खूबसूरत और नवीन नजर आता है।  कल ही जब आमेर होकर गुजरना पड़ा तो आँखें ठहर ही गयी पर्यटकों की मानिंद। आमेर महल की पृष्ठभूमि में  मावठे का साफ़ पारदर्शी जल जिसमे खूबसूरत बड़ी मछलियों का किलोल लुभा रहा था. 
 आमेर महल की चढ़ाई चढ़ते ही जयपुर के कछवाहा राजवंश   की कुलदेवी शिलामाता का मंदिर है। जयपुर के राजा मानसिंह बंगाल से मूर्ति लेकर आये थे हालाँकि और कई कथाएं भी प्रचलित हैं।  इस मंदिर की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यहाँ भोग लगाने के बाद ही मंदिर के पट खोले जाते हैं।  माता को गूंजी का भोग ही लगाया जाता है।  मावे और चीनी /बूरे  से बनी इस  मिठाई का स्वाद पेड़े जैसा ही होता है।  
आमेर घूमने आने वाले महल के आसपास  दुकानों से मावे की गूंजी और बेसन के गांठिए (नमकीन ) जरूर लेना चाहते हैं।  यदि आप आमेर भ्रमण कर चुके हैं तो इससे अवश्य परिचित होंगे और यदि आपको आमेर भ्रमण का मौका  मिले तो इसका स्वाद लेने से न चूकें !