क्या स्वाद है जिंदगी में

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शनिवार, 22 अगस्त 2020

गणपति को अर्पित हरे लड्डू...

 बेसन,मूँग , मक्का/बाजरा सब ही पीसेंगे. मूँग के लड्डू बनानेके लिए इस बार साबूत मूँग पीस लिए. आटे को चलनी से छानकर  घी मिलाकर खूब अच्छी तरह सेका. इलायची और बूरा शक्कर मिलाया और फटाफट हरे लड्डू बाँध लिये. हरी दूब के साथ गणपति को हरे लड्डू बिना रंग मिलाये अर्पित कर मन प्रसन्न हो गया.लड्डू बनाने की विधि वैसी ही जैसे की बेसन के लड्डू बनाते हैं. 

#मूँग के #लड्डू -

दो कटोरी मूँग के पीसे आटे में लगभग एक कटोरी घी डालकर भूनना है.  अच्छी तरह भून लें. लगभग डेढ़ कटोरी बूरा शक्कर या पिसी चीनी मिलायें. चार पाँच मोटी इलायची  कूट पीस कर डालें और #लड्डू बना लें.  

खूबसूरती बढ़ाने के लिए लड्डू पर वर्क या काजू/बादाम के टुकड़ों से सजाया जा सकता है.

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

सप्तरूचिलू (युगादि पर बनाये जाने वाला विशेष प्रसाद)

 पतझड़ के मौसम में सब पुराने पत्ते झड़ जाने के बाद नीम कच्ची नाजुक कोपलों से भर जाता है और साथ ही उस पर बौर (फूल) लद जाते हैं. नीम के आयुर्वेदिक गुणों से हम भारतीय भली भाँति परीचित हैं. नीम की दातौन ने वर्षों हमारे दाँतों की रक्षा की है तो चैत्र के महीने में कोमल कोपलों का सेवन  वर्ष भर के लिए हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को संरक्षित करता है. अपने दुर्लभ गुणों के कारण नीम आदि वृक्षों को परंपरा से जोड़कर स्वस्थ रखने की प्रक्रिया भारतीय संस्कारों में जन्मघूँटी की तरह दी गई है.
स्वस्थ रहने के प्राकृतिक प्रयोगों की परंपरा  में  इसी प्रकार नव संवत्सर (युगादि/उगादि) पर दक्षिण भारत में प्रसाद रूप में सप्तरूचिलू बनाने की प्रथा है. तीखा,खट्टा, मीठा, कड़वा,नमकीन आदि सात प्रकार के स्वाद एक ही साथ शामिल होने के कारण सप्तरूचिलू  नाम दिया गया. इस मौसम में आसानी से और ताजा उपलब्ध स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों को लेकर बनाया जाने वाला सप्तरूचिलू प्रकृति के आशीष रूप में ई्श्वर को अर्पित कर प्रसाद रूप में  ग्रहण किया जाता है.
 





सामग्री -
कच्ची केरी
इमली
गुड़
नमक
लाल मिर्च पिसी हुई
नीम के फूल
शहद

विधि-
कच्ची केरी को कद्दूकस कर लें या बारीक टुकड़ों में काटें. इमली को पानी में भिगोकर बीज निकालकर गाढ़ा घोल  (पल्प) बना लें.
गुड़ के बारीक टुकड़े कर लें . अब सभी सामग्री को शहद मिलाते हुए चम्मच से अच्छी तरह मिला लें. चटनी तैयार है.

युगादि पर भीगी हुई मूँग की दाल में आम (केरी) के कटे टुकड़े , नमक, मिर्च आदि मिलाकर भोग बनाया जाता है. साथ ही गुड़ का सादा पानी और सप्तरूचिलू  चटनी भी भोग अर्पण कर प्रसाद  रूप में ली और वितरित की जाती है.


शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

आमेर की गूंजी और गाँठिये ......

जयपुर एक खूबसूरत पर्यटन  स्थल है और अपने देश ही नहीं ,  विदेशों में भी ख़ासा लोकप्रिय है। आंकड़ों के बिना भी  यहाँ की सड़कों पर घूमते सैलानियों को देख कर ही  अनुमान लगाया जा सकता है। कुछ समय के अंतराल में अपने शहर की खूबसूरती को पर्यटक की तरह निहारने में बड़ा आनंद है.  तेजी से चल रहे विस्तारण और विकास कार्यों  के कारण हर बार और अधिक खूबसूरत और नवीन नजर आता है।  कल ही जब आमेर होकर गुजरना पड़ा तो आँखें ठहर ही गयी पर्यटकों की मानिंद। आमेर महल की पृष्ठभूमि में  मावठे का साफ़ पारदर्शी जल जिसमे खूबसूरत बड़ी मछलियों का किलोल लुभा रहा था. 
 आमेर महल की चढ़ाई चढ़ते ही जयपुर के कछवाहा राजवंश   की कुलदेवी शिलामाता का मंदिर है। जयपुर के राजा मानसिंह बंगाल से मूर्ति लेकर आये थे हालाँकि और कई कथाएं भी प्रचलित हैं।  इस मंदिर की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यहाँ भोग लगाने के बाद ही मंदिर के पट खोले जाते हैं।  माता को गूंजी का भोग ही लगाया जाता है।  मावे और चीनी /बूरे  से बनी इस  मिठाई का स्वाद पेड़े जैसा ही होता है।  
आमेर घूमने आने वाले महल के आसपास  दुकानों से मावे की गूंजी और बेसन के गांठिए (नमकीन ) जरूर लेना चाहते हैं।  यदि आप आमेर भ्रमण कर चुके हैं तो इससे अवश्य परिचित होंगे और यदि आपको आमेर भ्रमण का मौका  मिले तो इसका स्वाद लेने से न चूकें !